About Kokilavan

कोकिलावन शनि सिद्धपीठ भारत में उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में स्थित है कोसी से लगभग छ: (६) किलोमीटर दूर पश्चिम में बरसना के पास और नन्द गांव से सटा हुआ है, यह पवित्र स्थान भगवान शनि देव को समर्पित है, "कोकिला वन" जैसा कि नाम से ही झलकता है "कोयलों का वन" कहा जाता है युगों से यह स्थान कोयलों की मीठी कूहू -कूहू और प्राकृतिक रूप से रमणीय और मनोहारी है, कोकिलावन साक्षात् परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण की बाल -लीलाओं का केंद्र बृज-भूमि का एक अहम् भाग है, शनिदेव का सावला स्वरुप, श्री कृष्ण के श्याम वर्ण का पर्याय जैसा ही है, कृष्ण संपूर्ण हैं तो शनि कृष्ण को सम्पूर्ण बनाते हैं प्रकृति में संतुलन पैदा करके, प्राणीयों के साथ न्याय करके / बृज की कहानिओ - कहावतों में शनि देव की कथाओं का वर्णन मिलता है|

एक बड़ी ही रोचक कहानी भगवान श्री कृष्ण, शनि देव और कोकिला वन से जुडी हुई है जिसके अनुसार जब भगवान् श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी -देवता उनके दर्शन करने नन्द - गाँव आये और भगवान शनि देव भी उन के साथ श्री कृष्ण के दर्शन करने गए मगर माता यशोदा ने उन्हें बाल कृष्ण के दर्शन करने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें डर था कि शनि देव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए I मगर शनि देव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नन्द गाँव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे, उनका मानना था कि परमेश्वर श्री कृष्ण ने ही तो उन्हें पापियों और कुकर्मियों को दंड देने और मनुष्य को कुमार्ग पर जाने से रोकने के लिए कठिन समय लाकर मनुष्य के पुरुषार्थ को कुंदन की तरह शुद्ध बनाने का कार्य सोंपा है, फिर मैं तो सिर्फ उन्ही को दण्डित करता हूँ जो कुकर्मी हैं, पापी हैं, सज्जनों , सत-पुरुषों , भगवत भक्तों का सदैव कल्याण करता हूँ उनके पुरषार्थ को शीघ्र सिद्ध करके उनकी हर मुश्किल से रक्षा करता हूँ|

भगवान् श्री कृष्ण शनि देव कि तपस्या से द्रवित हो गए और शनि देव के सामने कोयल के रूप में प्रकट हो कर कहा - हे शनि देव आप निःसंदेह अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो और आप के ही कारण पापियों - अत्याचारियों - कुकर्मिओं का दमन होता है और परोक्ष रूप से कर्म-परायण, सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का कल्याण होता है, आप धर्मं -परायण प्राणियों के लिए ही तो कुकर्मिओं का दमन करके उन्हें भी कर्तव्य परायण बनाते हो, आप का ह्रदय तो पिता कि तरह सभी कर्तव्यनिष्ठ प्राणियो के लिए द्रवित रहता है और उन्ही की रक्षा के लिए आप एक सजग और बलवान पिता कि तरह सदैव उनके अनिष्ट स्वरूप दुष्टों को दंड देते रहते हो I हे शनि देव ! मैं आप से एक भेद खोलना चाहता हूँ ; कि यह बृज-क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और मैं इस पवित्र भूमि को सदैव आप जैसे सशक्त-रक्षक और पापिओं को दंड देने में सक्षम कर्तव्य-परायण शनि देव कि क्षत्र-छाया में रखना चाहता हूँ ; इसलिए हे शनि देव - आप मेरी इस इच्छा को सम्मान देते हुए इसी स्थान पर सदैव निवास करो, क्योंकि मैं यहाँ कोयल के रूप में आप से मिला हूँ इसी लिए आजसे इस पवित्र स्थान का नाम "कोकिलावन" के नाम से विख्यात होगा I यहाँ कोयल के मधुर स्वर सदैव गूंजते रहेंगे, आप मेरे इस बृज प्रदेश में आने वाले हर प्राणी पर नम्र रहें साथ ही कोकिलावन-धाम में आने वाला आप के साथ - साथ मेरी भी कृपा का पात्र होगा, उस पर शनि शाड-सती का शुभ प्रभाव होगा और प्राणी उत्तम जीवन का आनंद लेकर जीवन यापन करेगा I श्री कृष्ण के यौवन काल में कोयलों के इस वन में कोयल की कूहू - कूहू और बांसुरी कि धुन के बीच कृष्ण और गोपियों के नृत्य और संगीत की कहानिया आज भी यहाँ प्रचलित हैं|

कोकिलावन धाम का यह सुन्दर परिसर लगभग २० एकड में फेला है इसमें श्री शनि देव मंदिर, श्री देव बिहारी मंदिर, श्री गोकुलेश्वर महादेव मंदिर , श्री गिरिराज मंदिर, श्री बाबा बनखंडी मंदिर प्रमुख हैं यहाँ दो प्राचीन सरोवर और गोऊ शाळा हैं|

हर शनिवार को लाखों श्रद्धालु कोकिलावन धाम की "ॐ शं शनिश्चराय नम:" और जय शनि देव का उच्चारण करते हुए परिक्रमा करते हैं कुछ लोग परिक्रमा मार्ग पर बैठे भिखारियों को दान देते हुए अपनी परिक्रमा पूरी करते हैं I परिक्रमा मार्ग लगभग साढ़े तीन किलो मीटर लम्बा है जिसे साधारण गति से लगभग चालीस मिनट में पूरा किया जा सकता है|

बृज प्रदेश के निवासियों के अनुसार श्री कृष्ण ने जब शनि देव को दर्शन दिया था तब आशीर्वाद भी दिया कि यह कोकिला वन उनका है,और जो कोकिला वन की परिक्रमा करेगा, शनिदेव की पूजा अर्चना करेगा, वह मेरे साथ ही शनिदेव की कृपा भी प्राप्त कर सकेगा I जो भी भक्त इस शनि सिद्ध पीठ के दर्शन, पूजा पाठ का अन्तर्मुखी होकर सद्भावना से विश्वास करेगा, वह भी शनि की अमोघ कृपा प्राप्त करेगा, किसी भी उपद्रव से ग्रस्त नही होगा I यहां पर शनिवार को भक्तों का मेला लगता है I भक्त अपनी -अपनी श्रद्धानुसार कोई दंडवत परिक्रमा करता है तो कोई पैदल परिक्रमा करता है, जो लोग शनि देव का राजा दसरथ कृत स्तोत्र का पाठ करते हुए ,या शनि के बीज मंत्र का जाप करते हुये परिक्रमा करते हैं, उनको अतिशीघ्र चमत्कारिक प्रभाव अनुभव होते हैं और शुभ की प्राप्ति होती है|

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